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तेरे दर पर

तेरे दर तक आ पहुंचे हम….!! अपना पीछा करते-करते….!!

चाह नही तेरे...

चाह नही तेरे...

चाह नही तेरे हर पल पे अधिकार जताऊँ,
  तुझे तन्हाइयों में भी याद आऊँ तो काफी है....
ज़रूरत क्या मुझे तुमसे किसी रिश्ते के नाम की,
  नाम के रिश्तों से कुछ ऊपर उठ पाऊँ तो काफी है...
अपेक्षाएँ क्यों मुझे तुमसे हों जीवन के पथ पर,
  मैं तेरे लिए अंधेरी राह में मशाल बनूँ तो काफी है...
हम क्यों मिले थे ये सोच के पछताने से अच्छा है,
  मिले थे इसमें भी खुदा की रज़ा सोचूँ तो काफी है...
तुम मुझे न मिल सको तो भी गम नही कोई,
  तुम्हे ज़िन्दगी से रूबरू कराऊँ तो काफी है....
तुम्हे अपने दर्द ए दिल का कारण न बता कर,
  तेरे दर्द के निवारण में एक कण भी बन पाऊँ तो काफी है...


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