कतारें थककर भी - Shayari 500-1000 Note Ban




Shayari 500-1000 Note Ban
कतारें थककर भी खामोश हैं, नजारे बोल रहे हैं।
नदी बहकर भी चुप है मगर किनारे बोल रहे हैं।।

ये कैसा ज़लज़ला आया है दुनियाँ में इन दिनों,
झोंपडी मेरी खडी हैं और महल उनके  डोल रहे हैं।।

परिंदों को तो रोज कहीं से गिरे हुए दाने जुटाने थे।
पर वे क्यों परेशान हैं जिनके घरों में भरे हुए तहखाने थे।।

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