05 April, 2014

Bachpan Kuch Aise Beeta

Bachpan Kuch Aise Beeta
बचपन कुछ ऐसे बिता जैसे कुछ पल पहले मै बच्चा था
 कुछ ऐसा लगता है अब की शहर से तो मेरा गाँव अच्छा था
भुला सकते भी है कैसे हम अपनी बचपन की यादो को
 बर्फ का गोला ,चूरन की पुडिया घर में मकड़ी के जाला ही अच्छा था
जब सड़क पे गिराता कोई बालू अपना घर बनाने को
 हम चोरी से उनसे छोटे-२ घरौदे बनाते वो ही अच्छा था
भर के हम जब गुब्बारों में नालियों का गन्दा पानी
 एक दुसरे पे उछाला करते थे वो ही अच्छा था
अब के हमारे हीरो ,नेताओ ,घूसखोरो ,घुसपैठियों से तो
 हमारा नागराज ,सुपर कमांडो ध्रुव ,तेनालीराम अच्छा था
रिश्वतो ,मैच फिक्सिंग के बिना अब मजा कहा खेल में
 अपनी तो कांच की गोलिया वो गुल्ली -डंडा ही अच्छा था
अब दिन -रात पैसे कमा के बैंक कितना भी भर लो
 पर वो मुट्ठी में एक रुपये में लगता था संसार अपना था

1 comments:

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