26 April, 2010

किसी की आँख से

किसी की आँख से सपने चुरा कर कुछ नहीं मिलता

मंदिरों से चिरागों को बुझा कर कुछ नहीं मिलता

कोई एक आधा सपना हो तो फिर अच्छा भी लगता है

हजारों ख्वाब आँखों मैं सजा कर कुछ नहीं मिलता